बिहार में गमछा बना चुनावी पहचान – सियासी रंग में रंगा भोजपुर
बिहार में गमछा बना चुनावी पहचान – सियासी रंग में रंगा भोजपुर
आई एन न्यूज आरा (बिहिया), बिहार। भोजपुरी अस्मिता और पहचान का प्रतीक रहा बिहिया का गमछा इस बार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है। कभी खेत-खलिहान, मेहनतकश और अपनत्व की निशानी माना जाने वाला यह गमछा अब सियासत की चमक में रंग गया है।
जैसे-जैसे चुनावी माहौल गर्मा रहा है, वैसे-वैसे बिहार के बाजारों में गमछों की मांग अचानक बढ़ गई है। उम्मीदवारों के समर्थक से लेकर आम मतदाता तक, हर कोई अपने पसंदीदा राजनीतिक दल के रंग का गमछा कंधे पर डालकर अपनी निष्ठा दिखा रहा है।
प्रचार के दौरान प्रत्याशी जब गांव-गांव घूम रहे हैं, तो उनका स्वागत अब फूल-माला से नहीं, बल्कि गमछे से किया जा रहा है। किसी के गले में हरा गमछा, तो किसी के कंधे पर भगवा या नीला झलकता है — सियासी जोश का यह नया अंदाज अब पूरे भोजपुर और आसपास के जिलों में छा गया है।
बिहिया के बाजार में गमछा विक्रेता पप्पू यादव बताते हैं, “इस बार चुनाव का मौसम हमारे लिए त्योहार जैसा है। सुबह से शाम तक गमछे की बिक्री होती है। एक बार में कोई पार्टी वाले सौ-दो सौ गमछे उठा ले जाते हैं।” उन्होंने बताया कि थोक में एक गमछे की कीमत 60 से 80 रुपये तक है, लेकिन मांग इतनी है कि कई बार माल की कमी पड़ जाती है।
विभिन्न दल अपने-अपने रंग के गमछों से पहचान बना रहे हैं — राजद का हरा, जनसुराज और लोजपा का पीला, भाजपा का भगवा, तो वहीं भीम आर्मी और बसपा का नीला गमछा बाज़ार में खूब बिक रहा है। प्रत्याशियों के पास भी गमछों का ढेर लग गया है, जो वे अपने समर्थकों को भेंट करते नजर आते हैं।
कुल मिलाकर, भोजपुर की धरती पर गमछा अब सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक बन गया है। जिस तरह यह मेहनतकशों की पहचान रहा है, वैसे ही अब यह सियासत की नब्ज पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है।
(बिहार चुनाव)





