नेपाल: अपने ही नागरिकों से डरती सरकार—क्या बालेन शाह भारत संग रिश्तों को नए विवाद की ओर धकेल रहे हैं?
नेपाल: अपने ही नागरिकों से डरती सरकार—क्या बालेन शाह भारत संग रिश्तों को नए विवाद की ओर धकेल रहे हैं?
आई एन न्यूज नेपाल डेस्क:
नेपाल में हाल ही में लागू की गई नई कस्टम नीति ने भारत-नेपाल संबंधों को लेकर बहस तेज कर दी है। बालेन शाह सरकार द्वारा भारत से पैदल मार्ग से आने वाले 100 रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर कस्टम ड्यूटी सख्ती से वसूलने का फैसला लिया गया है। यह कदम अचानक लिया गया प्रतीत होता है, लेकिन इसके पीछे गहरे राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत देखे जा रहे हैं।
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर ने काठमांडू पोस्ट में अपने कॉलम में इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने लिखा कि यह निर्णय केवल एक आर्थिक या प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह सरकार की मानसिकता और प्राथमिकताओं में आए बदलाव को दर्शाता है। उनके अनुसार, यह एक ऐसे राष्ट्र की कहानी है जो अब अपने ही नागरिकों से डरने लगा है।
चंद्रकिशोर ने नेपाल-भारत के पारंपरिक ‘रोटी-बेटी संबंध’ का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच की खुली सीमा दशकों से सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्तों की आधारशिला रही है। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इस खुलेपन पर निर्भर रही है। लेकिन अब वही सीमा सत्ता में बैठे लोगों की नजर में ‘खतरे’ के रूप में देखी जा रही है।
उन्होंने अपने लेख में तीखी टिप्पणी करते हुए लिखा, “जब कोई देश अपने ही लोगों को खतरा समझने लगता है, तो यह साफ हो जाता है कि समस्या सीमा पर नहीं बल्कि शासन-प्रशासन के भीतर है।”
विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल सरकार की यह सख्ती आंतरिक असुरक्षा और राजनीतिक दबाव का परिणाम हो सकती है। वहीं, कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद की राजनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या बालेन शाह की यह नीति नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की तरह भारत के साथ संबंधों को तनावपूर्ण दिशा में ले जाएगी? ओली के कार्यकाल में सीमा विवाद और नक्शा विवाद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के रिश्तों में खटास पैदा की थी।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह कदम किसी बड़े कूटनीतिक टकराव की शुरुआत है या केवल सीमावर्ती व्यापार को नियंत्रित करने की कोशिश। लेकिन इतना जरूर है कि इस फैसले ने भारत-नेपाल के ऐतिहासिक और सहज संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नेपाल सरकार इस नीति को किस दिशा में ले जाती है और इसका दोनों देशों के आम नागरिकों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। (स्रोत नेपाली मीडिया)


