सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट़ करने की साजिश तो नही?
सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट़ करने की साजिश तो नही?

आई एन न्यूज ब्यूरो महराजगंज::ऐतिहासिक व प्राकृतिक धरोहरों से परिपूर्ण महराजगंज जिला, कुछ़ बड़े मायनों में उपेक्षा का शिकार हो रही। एक थोड़ा सा प्रयास जो कि महराजगंज जिले की पहचान को वैश्विक पट़ल पर ला सकती है। वह प्रयास हर बार आधी अधूरी सीढ़ियां चढ़ने के बाद धड़ाम हो कर धरा पर आ जाता है।
महराजगंज जिले का कुल क्षेत्रफल करीब २९३५ वर्ग किलोमीटर का है। जिसमें करीब ५८७ वर्ग किलोमीटर में फैले सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के घने जंगल अपने अंदर समेट़े प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को संजोए रखने की जद्दोजहद में है।
जंगल में मौजूद यह धरोहर देशी विदेश पर्यट़कों का प्रमुख आकर्षक केंद्र स्थल बन सकते हैं। मगर शासनिक नज़रअंदाजी से यहां सब कुछ़ ब्रिटिश कालिक की तरह ही है। यह बात अलग है जंगल के ये धरोहर अब जीर्णशीर्ण ,खंड़हर व मरमिट़ने के कागार पर आ गये हैं।
लक्ष्मीपुर रेंज के पास से जंगलों में जाने वाली ब्रिटिश कालिक ट्राम वे परियोजना की रेल लाइने जंग खाकर सड़ रही हैं, जंगलों में जगह-जगह बने ब्रिटिश कालिक बंग्ले खंड़हर में तब्दील हो रहे।
प्रकृति की दुर्लभ पारिस्थिकी समेट़े निचलौल क्षेत्र का दर्जिनिया ताल व उत्तरी चौक रेंज में करीब ५०० हेक्टेयर में फैला सिंगरैना ताल जल प्लवक अतिक्रमण से पट़ने के कागार पर है।
मगर केंद्रीय पर्यट़न मंत्रालय ने सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग को तबज्जो नहीं दिया।
ऐसा नहीं कि प्रयास नहीं हुए है।
वर्ष २०१२ के सितंबर माह में जिला व प्रदेश कमेट़ी सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग का कायाकल्प करने व इसे पर्यट़न के रुप में विकसित करने का खांका बनाया। करीब ६१४.८१ लाख रुपये के प्रस्तावित बजट़ को केंद्रीय पर्यट़न मंत्रालय ने खारिज़ कर दिया।
फिर जिला कमेट़ी ने ४ मई २०१३ को १८०.७१ लाख व ७१.५३ लाख की लागत के दो प्रस्ताव तैयार कर प्रदेश सरकार के भेजा। जिसमें ग्रास कट़ाई, चेस बोर्ड, रिक्त भूमि पर ग्रास लैंड़ , डबल वाटर लानिंग व रेस्ट हाउस बनाने का प्रयोजन था। लेकिन प्रदेश कमेट़ी में यह प्रस्ताव नामंजूर हो गया।
इसे महराजगंज के साथ नाइंसाफी कहा जा सकता है। जिसके पास पर्यटन हब बनने के सभी संसाधन मौजूद हैं, उसे मौका क्यों न दिया जाय? या फिर इसे एक साजिश माना जाय?
जो जंगल विदेश के प्रवासी पक्षियों को लुभा सकता है। वह निश्चित रुप से विदेशी सैलानियों का मनमोहेगा।
कई दशकों से रह रह जोर मारने वाली सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग की इस चीख़ को आखिर दबा क्यों दिया जाता है। क्या यह सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट़ करने की साजिश तो नहीं है?
जवाबदेही तो बनती है।





