—-पड़ताल खबरों का— कार्यवाहियों के बाद भी नहीं सुधर रहा पुलिस महकमा
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कार्यवाहियों के बाद भी नहीं सुधर रहा पुलिस महकमा
– नासूर बनी रिश्वतखोरी की आदत
आईएनन्यूज, महराजगंज:
पुलिस महकमें पर घूंसखोरी का आरोप लगना कोई नयी बात नहीं है। मगर पिछ़डे छेत्रों या नेपाल के सीमावर्ती एरिया में आते ही पुलिस के दामन पर छींटों के रंग और चटख हो जाते हैं।
हद तो यह है कि कई बड़ी कार्यवाहियों के बाद भी पुलिस कर्मी चेतते नज़र नहीं आ रहे हैं। कार्यवाहियों के दो बड़े मामलों को देखा जाय। तो कोल्हुई के वायरल वीड़ियो मामले में दारोगा समेत छह पुलिसवालों का सस्पेंड़ होना एक बड़ा मामला कहा जा सकता है। यहां ३५ हजार रुपया लेकर मामले को मैनेज का आरोप लगा है।
दूसरा मामला करीब डेढ़ वर्ष पहले सोनौली का रहा। जब नेपाल में मधेशी आंदोलन के कारण सीमा पर वाहनों की कतार लगी, पेट्रोलियम पदार्थों की तस्करी चरम पर रही। उस दौरान वाहनों के कटिंग के खेल में वसूली के आरोप में तात्कालिक सीओ पंकज कुमार सिंह समेत कोतवाल तथा छह अन्य पुलिसवालों पर भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हुआ साथ ही सस्पेंड़ हुये। उस समय मचे हडकंप और कार्यवाहियों की अफरा-तफरी से लोगों में यह आस जगी कि भ्रष्ट पुलिसकर्मी सबक लेगें। मगर हुआ नहीं। जिसकी बानगी कोल्हुई के वायरल वीड़ियो कांड में देखने को मिली।
गौर करने वाली बात यह है कि दोनों मामलों कार्यवाही आईजी के संग्यानता के बाद हुई है। जो कहीं न ही जिले के पुलिस कप्तानी की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में कर रहे हैं।
कल ही जिले के एक सिपाही का कथित घूंस लेते वीड़ियो वायरल होना। फिर एक पुलिसिया भ्रष्टता का ताजा उदाहरण है। इसके अलावा डायल सौ वाहनों की वसूली, पीड़तों के साथ पुलिस का दुर्व्यवहार, मालवाहक वाहनों से वसूली आये दिन ख़बरों में आती रहती हैं। सवाल यह कि क्या पुलिसकर्मियों के वेतन इतने कम हैं, कि उन्हें ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं? या फिर यह हमारे तंत्र में फैले भ्रष्टाचार के मकड़जाल का एक छ़ोटा उदाहरण मात्र है। जिसकी जड़े काफी गहरी हैं। यह चुनौती पुरानी सरकीरों के अलावा वर्तमान योगी सरकार के लिये भी एक कड़ी चुनौती है। देखने वाली बात यह होगी तमाम कार्यवाहियां पुलिसिंग को पटरी पर ला पाने के लिये सबक बन पायेंगी, या नहीं?





