सरकारी डाक्टरों की दलाली ले रही मासूमों की जान?
सरकारी डाक्टरों की दलाली ले रही मासूमों की जान?
एचएचआरएम घोटाले की तरह चल रहा सबकुछ़
आई एन न्यूज ब्यूरो:सरकारें बदल जाती हैं, विकास के वायदों की कथनी-करनी बदल जाती, कोई सत्तालोलुप्ता में लबरेज़ हो जाता है, तो कोई वोटबैंक की राजनीति में ऐन-केन तक कर जाता। पूर्वांचल में ऐसे जनसरोकार की बहुत सी चींजे बदलती हैं। मगर एक चीज़ नहीं बदली। वह है चिकित्सीय व्यवस्था। इंसेफेलाइटिस अभी भी पूर्वांचल का काल बनी हुई है। इसी तरह डायरिया और प्रसव मामलों में भी मौत के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
ब्लाक स्तर पर सरकारी प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अब चिकित्सा के लिये कम, अपितु दलाली के लिये अधिक चर्चा में हैं।
नौतनवा ब्लाक की स्थिति सबसे ख़राब है। चार जानें डायरियां से गयी और एक गरीब परिवार का कमाऊ व्यक्ति मस्तिष्क ज्वर से मर गया।
यहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाखों रुपये मुल्य की अत्याधुनिक जांच मशीनें तो हैं। मगर शायद ही कोई मरीज़ हो जो यह बताये कि उसकी जांच अस्पताल के मशीन से हुई हो। बाहर के दवाओं की पर्ची लिखना, प्राइवेट लैबों में जांच के लिये रेफर करना और एक्सीडेंटल मामलों में तो निश्चित रेफर करना यहां के चिकित्सकों की आदत में शुमार हो गया है। इस बावत सवाल पूछ़ने पर इनके जवाब भी आलाचिकित्साना हैं।
कुछ़ मरीजों के जागरुक तीमारदार इस व्यवस्था पर सवाल भी उठ़ातें है। सीएमओं तक को फोन घनघनातें है। मगर जवाब वही रटा रटाया सा मिलता है। देखेंगे,,जांच करेंगे। मगर होता कुछ़ नहीं है।
मजबूर तीमारदार अपने मरीजों को या तो प्राइवेट अस्पताल में ले जाते हैं, या गोरखपुर या फिर नेपाल ।
यह होता क्यों है,? पड़ताल की जाय तो एक ही जवाब मिलता है। दलाली सिर्फ दलाली। नीचे से ऊपर तक दलाली। और इस दलाली का शिकार हो रहे हैं, भोले-भाले मरीज़। सवाल यह कि स्वास्थ्य महकमें की इस नासूर बीमारी को हटायेगा कौन?
एचएचआरएम घोटाले की बात सामने आने पर आमआवाम में यह आस जगी कि थी कि अब स्वास्थ्य विभाग आदर्शता से काम करेगा। सीबीआई की जांच आयी, कुछ़ दोषी भी पाये गये। मगर कुछ़ ऐसी कार्यवाई नहीं हुई कि स्वास्थ्य विभाग के दलालों में दहशत छ़ा जाये।
आज भी चीज़ें एचएचआरएम घोटाले टाइप की चल रहीं हैं। मगर इसे रोकेगा कौन?
नौतनवा से धर्मेंद्र चौधरी की विशेष रिपोर्ट








































