“क्या “सबरी” गुल खिलायेगी- मीठ़े बेर चख़ायेगी? “
क्या “सबरी” गुल खिलायेगी- मीठे-बेर चख़ायेगी ?
आईएनन्यूज (धर्मेंद्र चौधरी की रिपोर्ट)

उत्तर प्रदेश में बाल विकास परियोजना के तहत चलने वाली तमाम योजनाएं अब एक “तमाशे” सी बनती जा रही हैं। यह ऐसा तमाशा है जिसकी परिणामी हक़ीकत से कोसों दूर सरकारें खुद ही अपनी शाबाशी की ताली पीटती है और वाहवाही लेती है।
बाल विकास परियोजना के अंतर्गत प्रदेश के गांवों कस्बों में आंगनबाड़ी केंद्र इस तमाशे की सज़ीव बानगी है। इसे कागज़ी सजीव कहा जाय तो और बेहतर होगा। हर केंद्र से नौनिहालों, कुपोषित बच्चों को भरपूर पुष्टाहार मिलता है। है कि नहीं? इतना भरपूर की पूरे प्रदेश में कुपोषण जैसी समस्या अपनी अंतिम सांस गिन रही है। तभी तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अपने वेतन वृद्धि व नियमित करने जैसी मांगों के रुप में अपना पुरस्कार मांग रहीं हैं, आंदोलन पर हैं।
प्रदेश की पिछ़ली समाजवादी पार्टी की सरकार बाल विकास परियोजना में हौसला पोषण योजना का इजाफ़ा चार चांद लगाने का दावा किया। नौनिहालों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं को पुष्टाहार दिया जाने लगा। ,,मतलब यह कि यूपी से कुपोषण खत्म होने ही वाला था कि सरकार बदल गयी। मगर सत्ता में आयी भाजपा सरकार ने अंतिम सांसे गिन रहे प्रदेश के कुपोषण से निगाह बेरुख़ नहीं की, पिछ़ली सरकार की “हौसला पोषण योजना” को बंद कर उससे बेहतर तर्ज पर “सबरी” योजना को ला रही है। मतलब की कुपोषण से जंग में एक इंच भी पीछ़े नहीं हटना है। इस योजना के अंतर्गत नवजात बच्चों के स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं और नौनिहालों को निश्शुल्क पुष्टाहार दिया जायेगा।,,,यानी कि कुपोषण का सिर कुचल कर उसे खत्म कर ही दिया जायेगा।
क्या ऐसा होगा? कागज़ पर होगा या हकीकत में होगा?,,,,बालविकास परियोजनाओं के पिटारों में जितनी योजनाएं हैं,,उससे दस गुना अधिक तो सवाल हैं। ,,ख़ैर बीती बातें व बीते सवाल तो आते रहेंगे यदाकदा। नया और बड़ा सवाल तो यही बन रहा है कि
“क्या “सबरी” गुल खिलायेगी- मीठ़े बेर चख़ायेगी? “





