महाव नाला: विभागों के पास नहीं है इस आफत के पुड़िया का इलाज
महाव नाला: विभागों के पास नहीं है इस आफत के पुड़िया का इलाज
– कागजों में नाला दर्ज होनें से बढ़ी परेशानी
आईएनन्यूज, नौतनवा (धर्मेंद्र चौधरी की रिपोर्ट)
नौतनवा ब्लाक के दर्जनों गांव हर साल बरसात में एक आफत झेलतें हैं।
यह आफत कुछ़ ऐसी होती है कि फसले बर्बाद होती हैं, गांवों व घरों में पानी भर जाता है, रास्ते जलमग्न हो जाते हैं,,,मतलब कि हाहाकार और बाढ़ जैसे हालात।
कुछ़ ऐसी ही तस्वीर होती है, महाव नाले से उपजी आफत के नज़ारे की।
अब ऐसी समस्या पर अधिकारियों के निरीछ़ण के बाद आपदा राहत के इंतजाम इतने सीमित व खानापूर्ती वाले होते हैं। कि लोग यह कह देते हैं कि अधिकारी तो केवल बाढ़ व तबाही की तफरी लेने आते हैं। मगर वर्ष दर वर्ष महाव के तबाही का मंजर जस का तस ही रहता है।
सवाल यह उठता है कि महाव जैसी आफत की पुड़िया का इलाज किसके पास है?
अगर महाव के कागजी स्वरुप को देखा जाय, तो कई सवालों के जवाब मिल जायेंगे। और यह भी कि महाव के आफत का सटीक इलाज, कम से कम प्रशासन या अधिकारियों के पास नहीं है।
कागजों में महाव एक नाला है। जो नेपाल के पहाड़ों से निकल महराजगंज में करीब २० किलोमीटर दूरी तय कर सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के जंगलों में समाप्त हो जाता है। जंगल में इसके समाप्ति स्थल के पट जाने से इसकी जलधारा बरगदवा और कोहरगड्डी गांव के आसपास के तीव्र मोड़ से तटबंधों को तोड़ देती है।
नाला होने के कारण सिंचाई विभाग इसकी मरम्मत व अन्य निर्माण के बावत हाथ खड़े देता है। नियमत: नदी या नहर होती तो सिंचाई विभाग प्रस्ताव बनाता।
नाला सफाई के लिये मनरेगा में प्राविधान है। कई वर्षों तक मनरेगा के तहत काम भी हुये। मगर कोई राहत नहीं मिली। गांव का मामूली नाला तो था नहीं, पहाड़ी नाला था। मनरेगा का करोड़ों रुपये का धन भी बहा ले गया। जिसे सीबीआई भी नहीं ढूंढ पायी। और महाव जैसी आफत की पुड़िया को नमस्कार कर वापस चली गयी।
जंगल में नाले की सफाई की एनओसी लेना टेढ़ी खीर है। ऐसे में आपदा राहत विकल्प है, जिससे जैसे-तैसे तटबंध मरम्मत का कोरम पूरा किया जाता है।
साफ है कि कागजों व नियमों के उधेड़ भून में महाव एक आफत की पुड़िया बन गया। जिसका इलाज नामुमकिन सा हो गया।





