‘लाल बुझक्कड़’ ,,जानता है कि कैसे-किसको मिला भाजपा का टिकट

'लाल बुझक्कड़' ,,जानता है कि कैसे-किसको मिला भाजपा का टिकट

'लाल बुझक्कड़' ,,जानता है कि कैसे-किसको मिला भाजपा का टिकट

लाल बुझक्कड़‘ ,,जानता है कि कैसे-किसको मिला भाजपा का टिकट

संवाददाता–धर्मेंद्र चौधरी
आई एन न्यूज ब्यूरो नौतनवा ..आइए आपको लालबुझक्कड़ से मिलाते हैं! ,,,क्या कहा आपने आप लालबुझक्कड़ को नहीं जानते? ,,अरे भाई यह वही लालबुझक्कड़ जी हैं, जो कभी कभी हमारी प्राचीन लघुकथाओं और लोकोक्तियों में आते हैं।
एक रोच़क लघुकथा यह भी है–

एक बार एक गांव के किनारे से हाथी चला गया। गांव के कुछ़ गीले खेतों में हाथी के पांव के निशान पड़ गये। जब ग्रामीणों ने उस निशान को देखा, तो वे कौतूहल की स्थिति में आ गये। कि आखिर यह निशान है किस चीज़ का? जवाब लालबुझक्कड़ ही दे सकता था, क्योंकि उस दौर में सवालों का जवाबी लालबुझक्कड़ को ही माना जाता था। ग्रामीणों ने लालबुझक्कड़ को बुलवाया, और खेत में पड़े निशानों के रहस्य को उजागर करने की मुनहार की। लालबुझक्कड़ ने बड़ी गंभीरता से निशानों का मुआयना किया। ग्रामीणों की निगाहें लालबुझक्कड़ के तरफ दी। एकाएक लालबुझक्कड़ मुस्काराया, उसे निशानों का राज पता चल गया था। उसने निशानों के रहस्य का पर्दा कुछ़ इस तरह उठ़ाया–

“बुझे लालबुझक्कड़, और न बूझे कोय,
गोड़े में जाता बांधि के, हरना कूदल होय!

ग्रामीणों ने ताली बजाई, और लाल बुझक्कड़ के बुद्धिजीविता की सराहना करते हुये अपने अपने घरों की तरफ चले गये।

कुछ़ ऐसी ही “लालबुझक्कड़ी चर्चाएं” नौतनवा व सोनौली निकाय चुनाव में भी शबाब़ पर हैं। सत्ताधारी भाजपा प्रत्याशी घोषित होने के बाद से चौक चौराहों से लगाये, नौतनवा व सोनौली के राजनैतिक गलियारे लालबुझक्कड़ी चर्चाओं से लबरेज़ हो रहे हैं। नौतनवा से जगदीश गुप्त को टिकट मिलने व सोनौली से महेंद्र जायसवाल का नाम सामने आने के पीछ़े राज़ क्या है। सभी इसके जवाब की टोह में है। ,,जगह-जगह एक से एक लालबुझक्कड़ अपनी अपनी कसीदें ढ़केल, सियासी सिरगर्मी की असीम अनुभूति में मस्त हैं।
नौतनवा से ओमप्रकाश जायसवाल को टिकट क्यों नहीं मिला? सोनौली से संजीव, गणेश व प्रदीप जैसे करीब दर्जन भर दावेदार क्यों टिकट के पात्र नहीं समझे गये। यह एक हाईवोल्टेज़ चर्चा का विषय बना है। और हर चर्चा स्थल पर लालबुझक्कड़ बंधुओं की बहुतायत हो जा रही है।
फिलहाल भाजपा ने जिस तरह निकाय चुनाव टिकट़ों की घोषणा की है, उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि उसका ध्यान २०१९ के लोकसभा चुनाव पर अधिक फोकस है। निकाय चुनाव के बहाने भाजपा अपने कमजोर जड़ों को मजबूत करने के प्रयास में है। फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि ,,बगावत के सुरों को भाजपा कैसे मैनेज़ करेगी?
आईये हम भी एक लाल बुझक्कड़ को खोजें जो कि यह बताये कि बागी भाजपाई किस तरफ़ जायेंगे?

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