तथ्यहीन समाचारो से दुखी है भारत नेपाल सीमा पर बसने वाले नागरिक

तथ्यहीन समाचारो से दुखी है भारत नेपाल सीमा पर बसने वाले नागरिक

तथ्यहीन समाचारो से दुखी है भारत नेपाल सीमा पर बसने वाले नागरिक —-
भारत-नेपाल रिश्तों को बिगाड़ने में लगे कुछ़ अख़बारी माहौल
आईएन न्यूज़, नेपाल:
भारत-नेपाल रिश्तों की संजीदगी से अंजान कुछ़ अख़बार ऐसे पहलुओं पर भी तथ्यहीन समाचार संकलन कर रिश्तों में खटास ड़ालने के माहौल उत्पन्न कर रहे हैं। जिस मुद्दे के ए बी सी डी तक उन्हें ठीक से नहीं आते। ऐसी ख़बरों पर भले ही टीआरपी बढ़ जाय। मगर इससे बन रहे माहौल के दूरगामी परिणाम नेपाल-भारत रिश्तों में गहरी खाई के रुप में आ सकते हैं।
यह माहौल बनाने का काम नेपाल के कुछ़ समाचार पत्रों से लगाये उत्तर भारत के कुछ कथित बड़े अख़बारों का है।
मुद्दा गंभीर है। “आतंकवाद” और “नेपाल के गृह आंदोलनों” पर इतनी आसानी कलम चल जा रही है, जैसे कि वह “हलवा” हो। ख़बरों की “प्रस्तावना” ऐसे पेश की जा रही है कि जैसे नेपाल में भारत विरोधियों की दुकानें खोली जा रही हैं। और ख़बर का “उद्देश्य” ऐसा है कि जैसे भारत-नेपाल की खुली सीमा पर “तार-बाड़” होना ही चाहिये।
शायद यह उन कथित अख़बारों के निम्नचेतक संपादकीय स्तर को भी दर्शा रहा है। जिन्हें पड़ोसी राष्ट्रों से सबंध व रिश्तों की बजाए अपनी “टीआरपी” और “वेतनवृद्धि” की अधिक चिंता है।
जिले और मंड़लस्तर की प्रमुख़ समस्या को ढंग से न लिख़ पाने वाले कथित पत्रकार विदेशी मामलों के सुपर फास्ट जानकार हो जाय! यह भी ग़जब के नये लेख़नी प्रथा का आगाज़ और विडंबना है।
ऐसी बिगड़ी मनोभावना ग्रसित समाचार प्रसारण की ही देन रही कि, रोट़ी-बेट़ी के रिश्ते वाला देश नेपाल तीन बार भारत के विरोध में वैश्विक पट़ल पर गुहार लगा चुका है। “आर्थिक-नाकाबंदी”, “आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप” व “राजनैतिक मामलों” में दबाव जैसे आरोप लगाये गये। जैसे तैसे भारत सरकार को इन मामलों में सफाई देनी पड़ी।
अब “नेपाल में आतंकियों का जमावड़ा”, “सीमावर्ती क्षेत्र में फैला आतंकियों का नेटवर्क”, “चीन का नेपाल में प्लेटफार्म” जैसे सनसनी खेज शीर्षकों के ईर्द-गिर्द तथ्यहीन ख़बर छ़ापने की मंशा जांच व विचार का विषय है।
यह स्पष्ट है कि ऐसे लेख लिख़ने वाले तथाकथित पत्रकारों को भारत-नेपाल, भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान, भारत-बांग्लादेश, भारत-श्रीलंका, भारत-भूटान व भारत-म्यानमार रिश्तों का तनिक भी ज्ञान नहीं है। अगर होता तो वह यह समझते हुये अपनी कलम चलाते कि भारत का अंतिम प्रगाढ़ मित्र नेपाल भी “रार” के पथ पर है। इस “रार की आग” में घी ड़ालने वाले लेख़ या समाचार निश्चित रुप से निंदनीय होना चाहिये। और उन लेखों की “ठोंक-बजानी” भी होनी चाहिये।
शायद ऐसी ही कुरीति के कारण नेपाल सरकार ने अपनी मीड़िया पर तमाम प्रतिबंध लगाये हैं। जरुरत यहां भी है।

नोट- उक्त लेख़ भारत-नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले सैकड़ों आम लोगों से वार्ता के निष्कर्ष पर लिख़ा गया है। जो भारत-नेपाल सीमा पर तार-बाड़ के पक्षधर नहीं हैं।

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