“सखी तू तो शहरी हो गयी, अब तो मुस्करा दे”

"सखी तू तो शहरी हो गयी, अब तो मुस्करा दे"

“सखी तू तो शहरी हो गयी, अब तो मुस्करा दे”

"सखी तू तो शहरी हो गयी, अब तो मुस्करा दे"

आईएनन्यूज (धर्मेंद्र चौधरी)

भारत-नेपाल सीमा की चर्चित दो सहेलियां सोनौली और बेलहियां आज अठख़ेलियों व रिझावन-मनावन की एक वार्ता में मशगूल सी हो गयी हैं। शर्मीली व चुप-चुप सी रहने वाली सोनौली अब गंवई से शहरी जो होने वाली है। बेलहियां उसकी पड़ोसन के साथ-साथ सदियों से एक प्रगाढ़ सहेली रही है। मगर बेलहियां आज भावुकता व व्यंग भरी बातें पूछ़ सखी सहेली के गंवई से शहरी बनने के परिवर्तन की कसक को उकेरने का प्रयास कर रही है।
मात्र दस गज़ की दूरी से एक दूसरे को निहारते हुये बेलहियां सोनौली के आंख के भाव को पढ़ने का प्रयास कर रही है। बेलहियां की हठदृष्टि पर आखिर सोनौली ने अपनी चुप्पी तोड़ी। बोली सख़ी गंवई पन का सुख देख नहीं पाई तो क्या हुआ, हो सकता है शहरी बनकर सारे सुख पाउं। ,,
तमन्नाएं खूब जाग उठ़ी हैं। जैसे कि वाहनों के चिल्लपों व प्रदुषण से निज़ात मिलेगा, जर्जर भवनों में को इंटीग्रेटेड़ भवन जैसा उपहार मिलेगा, जगह-जगह पेयजल व जलनिकासी की सुगम व्यवस्था होगी। वर्षों से गंदी व कूड़े-कचरे से पटी सड़कें व गलियां चमक उठेंगी,,।
विदेशी आयेंगे,,तो उसे बिना पलक झपकाये निहारेंगे। ,,,
बस कर पगली! । बेलहियां ने बीच में ही टोक दिया। सोनौली चुप हो गयी।
अब बेलहियां बोलने लगी – कहा कि सचमुच दोस्त बड़ी तमन्नाएं हैं तुम्हारी,, । जब तू गवंई थी, तब किसी ने ध्यान न दिया। किचड़ से सराबोर रहने वाले तेरे आंचल के परिषदीय स्कूल कई बार उलाहना दिये। गंदे पानी से भरे तालाबों के बीच आदर्श जलाशय डूब गया था।,,खैर चिंता न कर अब तो तेरे पास नौनिया, फरेंदी तिवारी, कुनसेरवा व पहुनी जैसी पुरानी सहेलियों का हाथ मिलगया है। गंवई कमियों की कसक छ़ोड़,, “सखी तू तो शहरी हो गयी, अब तो मुस्करा दे” ।

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