नेपाल में भड़का अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट: राजधानी से गांव तक फैली अराजकता
नेपाल में भड़का अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट: राजधानी से गांव तक फैली अराजकता
आई एन न्यूज काठमांडू, 10 सितम्बर (विशेष संवाददाता) —
नेपाल बीते 48 घंटों में इतिहास के सबसे भयावह और विध्वंसकारी संकट से गुजर रहा है। 07 और 8 को जो आंदोलन राजधानी की सड़कों पर शुरू हुआ था, वह अब पूरे देश को जला चुका है। एक ओर जहां सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता हालात को काबू में करने में असफल रहे, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शनकारी युवाओं ने पूरे राज्यतंत्र पर कब्जा कर लिया है।
शासन के तीनों स्तंभ ध्वस्त
नेपाल की कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका – तीनों प्रमुख अंगों को प्रदर्शनकारियों ने निशाना बनाया। सिंहदरबार, बालुवाटार और शीतल निवास जैसी प्रशासनिक और संवैधानिक इमारतें अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन, जिला अदालतें और बार एसोसिएशन – सब कुछ आग की भेंट चढ़ गया।
प्रदर्शन की चिंगारी बनी जनक्रांति
शुरुआत सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह आंदोलन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुशासन के खिलाफ जनविस्फोट में बदल गया। सोमवार को पुलिस की गोलीबारी में 19 लोगों की मौत के बाद हिंसा ने भयावह रूप ले लिया। मंगलवार तक यह संख्या 24 तक पहुंच चुकी थी।
प्रधानमंत्री ओली पर जनता का आक्रोश
हालात की गंभीरता के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने न तो इस्तीफा दिया और न ही कोई सहानुभूति दिखाई। यही रवैया जनता के धैर्य को तोड़ गया। अब खबर है कि सेना ने प्रधानमंत्री ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को किसी अज्ञात स्थान पर सुरक्षित पहुंचा दिया है।
नेताओं पर सीधा हमला, कई घायल
पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरजु देउबा पर बुढानिलकंठ स्थित निवास में हमला हुआ। दोनों गंभीर रूप से घायल हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ के खुमलटार निवास को भीड़ ने तोड़ दिया, जबकि चितवन स्थित आवास में आग लगा दी गई।
एमाले, कांग्रेस, माओवादी और अन्य प्रमुख दलों के शीर्ष नेताओं के घरों पर हमले और लूटपाट की खबरें लगातार आ रही हैं। गगन थापा, मोहन बस्नेत और झलनाथ खनाल जैसे वरिष्ठ नेता सीधे निशाने पर हैं। खनाल की पत्नी रविलक्ष्मी चित्रकार आगजनी में झुलस गईं।
हवाई अड्डे, धार्मिक स्थल और न्यायिक संस्थान भी निशाने पर
भैरहवा एयरपोर्ट प र आगजनी हुआ है, वहीं त्रिभुवन एयरपोर्ट को बंद कर दिया गया है। प्रदर्शनकारियों ने वहां भी घुसने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट, विशेष अदालतें और अन्य न्यायिक संस्थाएं पूरी तरह नष्ट कर दी गई हैं। धार्मिक स्थलों को भी नहीं बख्शा गया।
जेलों पर हमले, कैदी फरार
देशभर की जेलों से हजारों कैदी फरार हो चुके हैं। नख्खु जेल सहित कैलाली, महोत्तरी, तनहुँ और पोखरा की जेलों पर हमले हुए हैं। पुलिस थानों को लूटा गया, हथियार छीने गए और आगजनी की गई।
स्वास्थ्य तंत्र और आपात सेवाएं ठप
हजारों घायल लोग बिना इलाज के तड़प रहे हैं। अस्पतालों में जगह नहीं है, एंबुलेंस और दमकल वाहन उपलब्ध नहीं हैं। स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह चरमरा चुकी है।
सामाजिक ताना-बाना बिखर गया
1990 और 2006 के आंदोलनों के विपरीत इस बार कोई संगठित सुरक्षा समिति या नेतृत्व नहीं है। अराजकता ने हर नागरिक को असुरक्षित कर दिया है। लूट, आगजनी और हिंसा आम हो गई है।
नेपाल के भविष्य पर सवाल
नेपाल की वर्तमान स्थिति एक अघोषित गृहयुद्ध जैसी प्रतीत हो रही है। शासन व्यवस्था का कोई स्पष्ट केंद्र नहीं बचा है। सवाल यह है कि क्या नेपाल इस अराजकता से उबर पाएगा? क्या कोई नया नेतृत्व आगे आएगा? या फिर देश पूरी तरह विघटन की ओर बढ़ रहा है?
स्थिति बेहद गंभीर है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अब इस संकट पर नजर रखे हुए है। नेपाल की धरती एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।





