डीएम साहब! अख़िर कौन करेगा राशनकार्ड़ों का सत्यापन?

डीएम साहब! अख़िर कौन करेगा राशनकार्ड़ों का सत्यापन?

डीएम साहब! अख़िर कौन करेगा राशनकार्ड़ों का सत्यापन?
– लेख़पाल, सक्रेटरी झाड़ रहे पल्ला, बीएलओ भी परेशान
आईएन न्यूज, नौतनवा( धर्मेन्द्र चौधरी की रिपोर्ट):

शासन या प्रशासन भले की सार्वजनिक वितरण की दुरुस्तगी के लाख़ दावे करे, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी वितरण प्रणाली लुंज-पुंज और हमेशा की तरह बीमार ही है। नौतनवा क्षेत्र के लगभग सभी गांवों के सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान या कोटेदार से अनियमितता की शिकायत आना अब एक आम बात सी हो गयी है। इन सभी अनियमितताओं के बीच योगी सरकार ने अभी हाल ही में निर्देश जारी किये कि सभी गांवों में राशन कार्ड धारकों व राशन कार्ड के लिये आवेदित लोगों की ड़ोर-टू-ड़ोर स्थलीय सत्यापन किया जायेगा। एक विभागीय नोड़ल अधिकारी के नेतृत्व में हल्का लेख़पाल, ग्राम सेक्रेटरी व बीएलओ की संयुक्त टीम राशन कार्ड़ो का सत्यापन व निरस्तीकरण करेगी।
यह फ़रमान कोटे का राशन, तेल व चीनी आदि न पा रहे ग्रामीणों के लिये सुख़दायी रही। लगा कि “अच्छ़े दिन” आ ही गये हैं। मगर अब राशनकार्ड़ सत्यापन के मामले में शुरु हुये विभागीय तानेब़ाने के बीच सत्यापन प्रक्रिया का रुक जाना। एक दूसरा ही ट्विस्ट सामने ला दिया है। ग्रामीणों में आक्रोश के स्वर बुलंद हैं। साथ ही ग्रामीण अब आलाअफ़सरान से सवाल पूछ रहे हैं कि “साहब ! आख़िर कब होगा राशन कार्ड़ का सत्यापन”।
नौतनवा तहसील क्षेत्र के करीब 185 गांवों में यही हाल है। कारण भी कमाल के हैं।
लेख़पाल कह रहे हैं कि उन्हें ड़ोर-टू-ड़ोर सत्यापन करने के लिये अलग से मानदेय चाहिये। सेक्रेटरी कह रहे हैं कि उनके पास कई गांवों के चार्ज हैं, ऐसे में उनका सत्यापन टीम में रहना काफी बोझ वाला काम है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या बूथ लेवल अफसर का कहना है कि वह छोट़े दर्जे के कर्मचारी हैं। सत्यापन फार्म में भूमि व आय जैसे विषयों पर जानकारी मांगी गयी है। वह ऐसे जानकारी का जिम्मा क्यों लेंगे।
गौर करने वाली बात यह है कि लेख़पाल और बीएलओ ने अपनी शिकायत उपजिलाधिकारी आलोक कुमार के पास भी दर्ज करायी है।
वहीं दूसरी तरफ गांव के सेक्रेटरियों ने अपनी समस्या खंड़ विकास अधिकारी के समक्ष पेश कर दी है।
जिससे 30 जून तक पूरा होने वाला राशनकार्ड़ सत्यापन अभियान शुरुआती दौर में ही चरमरा गया है।
अब इस समस्या का हल योगी सरकार या उनके मातहत कैसे निकालेंगे यह बाद की बात होगी। इसी बाद की बात में ग्रामीण भी आस में हैं कि “अच्छे दिन आयेंगे”,,,!

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